Kartik

इन मासूम सी आँखों में नव जीवन के अंकुरित होते सपनों की चमक कुछ यूँ बिखरी सी है जैसे सूर्योदय की पहली किरण, और रात के स्याह पटल पर लहराती सुबह की आहट जैसे शीत लहर के बाद की पहली धूप से मिलती अंतः को गर्माहट जैसे सूखी धूल-धूसरित धरती पर मेघ की पहली गर्जनContinue reading “Kartik”

आकार

कुछ आकार सा ले रहा है विचारों के बादलों को कुछ दिशा सी मिल रही है धुंधली तस्वीरों पर छाया कोहरा छंट सा रहा है इस नितदिन के कोलाहल में कुछ साकार सा हो रहा है कुछ आकार सा ले रहा है, एक नियम सा, एक दिनचर्या सी इस व्यस्तता की एक अपेक्षा सी। हरContinue reading “आकार”

बचपन

मेरे कमरे की बालकनी से बाहर गली, मकानों और पेड़ों के बीच अब भी बचपन खेलता हुआ दिखता है शाम के हुल्लड़ और झगड़ों में , मुझे दूर दूर से अजनबी सा देखता है कल जो मेरा आज था , आज वही  एक मजबूर  सा, एक भूले हुए एहसास सा जूझता  है इन सड़को पर कंधेContinue reading “बचपन”

खिड़की

मेरी खिड़की के बाहर एक बेचैन सा सागर रहता है क्षितिज से भी दूर तक, ऊंचाइयों एवं गहराइयों में लहराता हुआ सा वो कुछ यूँ बहता है मानो मंजिल का पता ही नहीं, न ही जानने की परवाह है बस इस अनर्गल से कलह में घुले हुए रोष को, बेबस होकर कुछ यूँ सहता है कि दसोContinue reading “खिड़की”