Before I take the plunge

Before I take the plunge

Along the edge of a beautiful shore I sit

And play around with anticipation and excitement

Of the mystery that lies ahead, of the palpable vibrations in each breath

On the side of an ocean of endless possibilities and unfathomable depth

A few steps before I crossover, from one side of lighted charades

To the other of serene and monochromic shades

With the apparent calmness of the surface

Broken intermittently by the incessant waves

Which try relentlessly, albeit less vehemently to cross over again

But are stopped by an invisible pull to be contained and content

Only the content never seems to lack in passion

A strange palette of poise, passion, rebel and subversion

What is it, that makes it an enchanting, an irresistible invite, I wonder

And a breeze just caresses my face with a sprinkle of the sea

And hints of your voice, your touch and your being

The waves calm down, return to the sea

The shores suddenly are more enticing

Can’t wait to take the plunge, to discover and dive

Let’s begin, together what they call is a beautiful life!

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You

Once upon a time

In days of adolescence and thoughts so pure

Asked a question to myself, my version of yore

Who is she, the one of your dreams, the one for you?

A name, a picture or a thought out of the blue

The answer, it is here, through life and years

Through exploring myself and growing in layers

 

She is,

This painting of perfect colors

All my imaginations, dreams and fantasies

All my aspirations, hopes and necessities

Every little detail of my vivid desires

Rolled into one, and filled with ice and fires

 

She is,

The perfect poise to my chaos

The sonorous noise to my silences

The seamless rationale to my biases

An easy foil to my follies

A breezy cure to my pain

And an easy allure to a new world.

A world with her

That of unparalleled addiction, of reality and imagination

Of being with her, of feeling her touch

On my body and my soul

Of being with her, in parts and in whole

 

She is,

An imagination blending into reality

Off late, a clear picture of thoughts with a name

A voice, an opinion, a being and a face so pretty

Like the dawn of a morning with drops of dew

I think of all this, and love sprouts out of the blue

She is, need I say, my own precious You.

 

 

Wanderlust

Amidst days of mundaneness

Through nights of restlessness

A wave of pulsating thoughts

A flash of craving, of images of wilderness

I am gripped by this sudden surge

Of breaking free, of forgetting fears, of forging a fable

Of giving in to this feeling

This feeling of living a dream,

A dream which was lived through

A fable which is real, only it doesn’t seem so

Even the mortal evidences seem to lie

That feeling that sensation continues to weaken

The images in mind and in physics keep blurring

And the craving gets stronger

To break this mundane routine and revisit the dream

To relive the wanderlust

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आकार

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                      कुछ आकार सा ले रहा है

             विचारों के बादलों को कुछ दिशा सी मिल रही है
             धुंधली तस्वीरों पर छाया कोहरा छंट सा रहा है
           इस नितदिन के कोलाहल में कुछ साकार सा हो रहा है
                    कुछ आकार सा ले रहा है,
                 एक नियम सा, एक दिनचर्या सी
                 इस व्यस्तता की एक अपेक्षा सी।

          हर एक दिन की अनिश्चितता अब कुछ निश्चित सी है,
          क्लेश और कलह की हलचल भी एक पूर्वानुमान सी है
              इस आकार में एक ख़ुशी है ,एक ठहराव भी है
            यदि नवीनता से अलगाव ,तो ठहराव से जुड़ाव भी है
                 शाम का उत्साह व सुबह का अवसाद
               दिनभर की हलचल और रात की स्थिरता
               सब कुछ अब जाना पहचाना सा लगता है
          किसी अचरज का इंतज़ार, इंतज़ार अंतहीन सा लगता है
             वह भावनाओं का अतिरेक , जज़्बातों का वेग
        थमा हुआ सा , एक दिनचर्या के तले सांसें गिनता हुआ सा लगता है।
              और देखता हुआ झलक , उस भविष्य की
                    जहाँ न धुंध हैं न बादल है
                    जहां हर दिन हर दिन जैसा है
               अतिरेक व् उत्तेजना की न कोई फेरबदल है
                उस सम्पूर्ण फलक में रंगों का यह चित्र
                       एक आकार सा ले रहा है

			

Like a flowing river

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Like a flowing river
Peaceful, serene, soothing and calm
On your sides, I breathe easy
By your sides, I drop the yards of pretension
Shed my masks of belief
In your closeness, I let go off the noise
Of surroundings and insides
The sounds made in the silence
You, an absorber of them
You, the dilution of intensity
The intensity of mildness
The direction to lost thoughts
In your flow, lies a poise, a balance
Like a gentle melody Of the flowing waters
Moving ahead, with the traces of times,
Some carried along, some left behind
The sound of peace, of relief, of moving
With your own pace, in your own world
A flowing river, a gentle melody.
Like a beautiful painting
Quite, vulnerable, delicate, beautiful
Bearing the prints of the past
Blemished, tampered, Yet pure, yet true
Meddled with life, deepened by sorrow
Like a pensive mood
You.

बचपन

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मेरे कमरे की बालकनी से

बाहर गली, मकानों और पेड़ों के बीच अब भी बचपन खेलता हुआ दिखता है

शाम के हुल्लड़ और झगड़ों में , मुझे दूर दूर से अजनबी सा देखता है

कल जो मेरा आज था , आज वही  एक मजबूर  सा, एक भूले हुए एहसास सा जूझता  है

इन सड़को पर कंधे पर बैग टाँगे स्कूल जाते थे,

उन पर आज ट्राली बैग लेकर भूले बिसरे आना भी एक सपने सा लगता है

सड़कों पर बिछी कई परतों में, वक़्त  के साथ साथ वो मिटटी भी खो गयी है

जिसपर बने गड्ढों में बारिश में नाव चलाते थे, अब उसकी परतों में दबी सिर्फ याद है

गड्ढे तो वो अब भी हैं, पर ना मिटटी में वो खुशबू , न ही उन दोस्तों का साथ है

टाफी  वाली दुकान  तो वहीँ है , पर न वो अंकल , न उनसे करने को कोई बात है

पेड़ों की घनी हरियाली अब ठूंठ बनने की ओर अग्रसर दिखती है ,

पूँछ हिलाते हुए पीछे घूमने वाले वो जानवर भी अब अनजान से लगते हैं ,

सूंघ सूंघ कर इस मिटटी में दबी बचपन की खुशबू का ज़िक्र खोजते हैं


मेरे कमरे की बालकनी से

अंदर की  दीवारों अलमारी व दराजों में, एक कहानी लिखी हुई सी दिखती है

तस्वीरों, पोस्टरों, नोटबुकों और उस रेडियो में बयान वो

अब एक मूक फिल्म सी सन्नाटे में सब कुछ कहती हुई लगती है

कैसेट से ऍफ़ एम , वीडियो गेम से लैपटॉप तक के सफर के निशान

अब भी इस कमरे में महसूस होते हैं

चित्रहार से यू ट्यूब तक के गानों की तरंगें भी शायद इन दीवारों में लहराती हैं

वो कहानी , जिसमे पात्र भी हम, और दर्शक भी हम

जिसमें चेहरों पर निशाँ भले बढ़ गए हो, पर सवाल अब भी उतने ही हैं

पास जितना भी हूँ इसके, पर फासले न जाने कितने ही हैं

दिन, महीनो , वर्षों के ; बचपन, लड़कपन और जवानी के.

किस पड़ाव पे इसको छोड़ चले

प्रगति की आस में ऐसी होड़ तले

जो बंजारे सा निरंतर भटका, जड़ों से अपनी दूर चला

अपनी आत्मा के टुकड़ो को, यहाँ वहां बदस्तूर छोड़ चला

इस बालकनी,  इस गली,इस शहर में ढूँढू उन्हें  कहाँ कहाँ


मेरी गली के बाहर ,

उस मंदिर के आँगन में ,  उन सुबहों की यादें दिखती है

सूरज से पहले जब दादाजी, व्यायाम कराने लाते थे

चप्पलों के ढेर के पास वो नींद जो प्यारी लगती थी

फिर भजन और घंटी की धुन पे, सूरज के साथ ही आखें खुलती थी

दीवार वही है, ढेर वही है , मंदिर में भगवान वहीँ है

बस दूर से आती आवाज़ें हैं

भजन और  घंटी की धुन में मिश्रित अनर्गल शोर शराबे हैं

देर सवेरे मंदिर के आँगन में बिखरे, फूलों की पंखुड़ियों से मेरे बचपन के टुकड़े


मेरे शहर से होकर एक  जीवन धारा बहती है

उस जीवनदायिनी माँ को देखकर आज भी

हाथ संग दिल के तार कई यूँ जुड़ते हैं

घाटों के उस पार मुझे अनर्गल  पल यूँ  बिखरे मिलते हैं

मंदिरों और शिवालों के प्रांगण में, बचपन के कुछ सपने भूले बिसरे हैं

सीढ़ियों को भिगोती लहरों में कुछ चश्में और सिक्के जो  गुम से हैं

सागर को जाते वेग में  जो जलते दिए डूबे से थे

आज दरकती लहरों में , वे बुझे हुए कुछ दिखते  से हैं

नावों की डगमग गति  में कई नींद के झोंके जो खोये से थे

आज ठहरी नैया में वो कुछ शांत,  खुद कुछ सोये से हैं

उस पार जो रेतीली धरती में , मिटटी के घर बनाये थे

आज वो अपने ‘फ्लैट’ से ज़्यादा अपने लगते से हैं

इन किनारों में और लहरों में,

रेत के बनाये हुए उन महलों में

जो सार बन गए हैं जीवन का, अभीष्ट सभी सपनों का

जो ले गए है दूर जहाँ , न ये लहरें न ही साथ अपनों का

इस जल में कहीं बचपन की सरलता सी दिखती है

प्रदूषित उस मासूमियत की छवि ,इस काले हो रहे पानी पर पड़ती है

इस अविरल धारा में, इस माँ की गोद  में

तेरे जल में डूब कर, निर्मल , पावन हो जाना चाहता हूँ

आज फिर बचपन को जीना चाहता हूँ।

खिड़की

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मेरी खिड़की के बाहर

एक बेचैन सा सागर रहता है

क्षितिज से भी दूर तक, ऊंचाइयों एवं गहराइयों में

लहराता हुआ सा वो कुछ यूँ बहता है

मानो मंजिल का पता ही नहीं, न ही जानने की परवाह है

बस इस अनर्गल से कलह में घुले हुए रोष को, बेबस होकर कुछ यूँ सहता है

कि दसो दिशाओं में बढ़ता हुआ सा, वो निराकार व निरंकुश सा

भव्य पर भयावह सा, शोर में कुछ कहता सा है

इस ऊंचाई पर, इस शोर में, सहमाती सी गहराइयों में, आगे जाने की इस होड़ में

एक ठहराव , एक संगीत , एक धरातल, एक शब्द सी

तुम .

मेरी खिड़की के बाहर

एक चाँद और कुछ तारे बिखरे से हैं

अशांत उस सागर से अछूते, इन ऊंचाइयों और गहराइयों से अभिन्न

बहाव के शोर से अविचलित, स्वयं की दुविधा में  बुझते जलते

उनको इस पाषाण सागर के किसी किनारे से देखती यूँ अविराम सी

तुम.

मेरी खिड़की के बाहर

एक ख्वाहिशों का तूफ़ान उमड़ता है

जलती तपती धूप में, कभी धुंए कभी ओस का, सैलाब सा बनता बिगड़ता है

ख्वाहिशें, कुछ पाने की कुछ छीनने की

कुछ ठंडी ओस सी कुछ काले धुंए सी, तूफानों में घिरी इन दीवारों में

धुओं में छुपी इन इमारतों में कहीं,  बारिश की पहली बूंदों सी

शांत सुन्दर शीतल सरल सी,  सभी ख्वाहिशों की से परे

तूफानों के बीच थमी हुई एक चाहत सी

तुम.

मेरी खिड़की के बाहर

एक मेला सा लगता है

अनजाने अजनबी चेहरों का, कुछ पहचाने अजनबी चेहरों का

इस सागर में सैलाब में, तूफ़ान में इस मेले में

एक पहचान तलाशते इस भीड़ में इस रेले में

धुंए के साथ जलते, लहरों के साथ बहते,  अपरिचित भावो वाले वो चेहरे

उम्मीद आशंका अविश्वास से डरे,  विश्वास व ख़ुशी के परदो से ढके

इन चेहरों में कहीं वो एक, जाना पहचाना सा, अपना सा माना सा

पल पल बदलते मेले में एक ठहराव मनमाना सा

तुम.

मेरी खिड़की के अन्दर

एक मैं और एक मैं , आपस में यूँ प्रलाप करते हैं

बेतहाशा अनायास सा ये सागर, सहरता भरमाता सा ये सैलाब

अब क्यों अपने से कुछ लगते हैं

ये चाँद ये रफ़्तार, ये लहरें ये ख्वाहिशें

नींद भरी आँखों में सुबह के सपने से क्यूँ लगते हैं

अनजान राहगीरों का ये मेला , अब एक जलसा सा क्यूँ लगता है

निराकार निरंकुश यह दृश्य , अब एक स्वप्न नगरी  सा क्यों लगता है ?

लहरों की ऊंची छलांग में , चाँद की शीतल छाँव में,

ख्वाहिशों के उस जूनून में , मेले की उस रौनक में

जो ख़ुशी है , जो जादू है , जो प्यार है,

वो हो तुम .

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