मौसम

शाम का वो ढलता सूरज , वो धुंधलाता-सा आसमान gumगुम होती सी ये मद्धम किरणें, और कुछ डूबते से अरमान , उन ठंडी बेज़ार हवाओं में जब दीप न कोई जल पाए दो आँखों की उस चमक से बस, सारा अँधियारा छंट जाए … हाँ, कुछ ऐसा ही है जीवन ये… दिन छुपे या चाहेContinue reading “मौसम”

उड़ान

रास्तों में है अँधेरा घना या फिर खुद की ही हैं आँखें बंद ? राह है लंबी अंतहीन या खुद की ही है चाल मंद ? क्यों न जान पाता कभी ये मन क्यों होती ये दुविधा ये उलझन जो पाता देख  स्वयं के पार तो जान पाता, क्या है यह बंधन, या खुद काContinue reading “उड़ान”