बचपन

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मेरे कमरे की बालकनी से

बाहर गली, मकानों और पेड़ों के बीच अब भी बचपन खेलता हुआ दिखता है

शाम के हुल्लड़ और झगड़ों में , मुझे दूर दूर से अजनबी सा देखता है

कल जो मेरा आज था , आज वही  एक मजबूर  सा, एक भूले हुए एहसास सा जूझता  है

इन सड़को पर कंधे पर बैग टाँगे स्कूल जाते थे,

उन पर आज ट्राली बैग लेकर भूले बिसरे आना भी एक सपने सा लगता है

सड़कों पर बिछी कई परतों में, वक़्त  के साथ साथ वो मिटटी भी खो गयी है

जिसपर बने गड्ढों में बारिश में नाव चलाते थे, अब उसकी परतों में दबी सिर्फ याद है

गड्ढे तो वो अब भी हैं, पर ना मिटटी में वो खुशबू , न ही उन दोस्तों का साथ है

टाफी  वाली दुकान  तो वहीँ है , पर न वो अंकल , न उनसे करने को कोई बात है

पेड़ों की घनी हरियाली अब ठूंठ बनने की ओर अग्रसर दिखती है ,

पूँछ हिलाते हुए पीछे घूमने वाले वो जानवर भी अब अनजान से लगते हैं ,

सूंघ सूंघ कर इस मिटटी में दबी बचपन की खुशबू का ज़िक्र खोजते हैं


मेरे कमरे की बालकनी से

अंदर की  दीवारों अलमारी व दराजों में, एक कहानी लिखी हुई सी दिखती है

तस्वीरों, पोस्टरों, नोटबुकों और उस रेडियो में बयान वो

अब एक मूक फिल्म सी सन्नाटे में सब कुछ कहती हुई लगती है

कैसेट से ऍफ़ एम , वीडियो गेम से लैपटॉप तक के सफर के निशान

अब भी इस कमरे में महसूस होते हैं

चित्रहार से यू ट्यूब तक के गानों की तरंगें भी शायद इन दीवारों में लहराती हैं

वो कहानी , जिसमे पात्र भी हम, और दर्शक भी हम

जिसमें चेहरों पर निशाँ भले बढ़ गए हो, पर सवाल अब भी उतने ही हैं

पास जितना भी हूँ इसके, पर फासले न जाने कितने ही हैं

दिन, महीनो , वर्षों के ; बचपन, लड़कपन और जवानी के.

किस पड़ाव पे इसको छोड़ चले

प्रगति की आस में ऐसी होड़ तले

जो बंजारे सा निरंतर भटका, जड़ों से अपनी दूर चला

अपनी आत्मा के टुकड़ो को, यहाँ वहां बदस्तूर छोड़ चला

इस बालकनी,  इस गली,इस शहर में ढूँढू उन्हें  कहाँ कहाँ


मेरी गली के बाहर ,

उस मंदिर के आँगन में ,  उन सुबहों की यादें दिखती है

सूरज से पहले जब दादाजी, व्यायाम कराने लाते थे

चप्पलों के ढेर के पास वो नींद जो प्यारी लगती थी

फिर भजन और घंटी की धुन पे, सूरज के साथ ही आखें खुलती थी

दीवार वही है, ढेर वही है , मंदिर में भगवान वहीँ है

बस दूर से आती आवाज़ें हैं

भजन और  घंटी की धुन में मिश्रित अनर्गल शोर शराबे हैं

देर सवेरे मंदिर के आँगन में बिखरे, फूलों की पंखुड़ियों से मेरे बचपन के टुकड़े


मेरे शहर से होकर एक  जीवन धारा बहती है

उस जीवनदायिनी माँ को देखकर आज भी

हाथ संग दिल के तार कई यूँ जुड़ते हैं

घाटों के उस पार मुझे अनर्गल  पल यूँ  बिखरे मिलते हैं

मंदिरों और शिवालों के प्रांगण में, बचपन के कुछ सपने भूले बिसरे हैं

सीढ़ियों को भिगोती लहरों में कुछ चश्में और सिक्के जो  गुम से हैं

सागर को जाते वेग में  जो जलते दिए डूबे से थे

आज दरकती लहरों में , वे बुझे हुए कुछ दिखते  से हैं

नावों की डगमग गति  में कई नींद के झोंके जो खोये से थे

आज ठहरी नैया में वो कुछ शांत,  खुद कुछ सोये से हैं

उस पार जो रेतीली धरती में , मिटटी के घर बनाये थे

आज वो अपने ‘फ्लैट’ से ज़्यादा अपने लगते से हैं

इन किनारों में और लहरों में,

रेत के बनाये हुए उन महलों में

जो सार बन गए हैं जीवन का, अभीष्ट सभी सपनों का

जो ले गए है दूर जहाँ , न ये लहरें न ही साथ अपनों का

इस जल में कहीं बचपन की सरलता सी दिखती है

प्रदूषित उस मासूमियत की छवि ,इस काले हो रहे पानी पर पड़ती है

इस अविरल धारा में, इस माँ की गोद  में

तेरे जल में डूब कर, निर्मल , पावन हो जाना चाहता हूँ

आज फिर बचपन को जीना चाहता हूँ।

8 thoughts on “बचपन

  1. जिसपर बने गड्ढों में बारिश में नाव चलाते थे, अब उसकी परतों में दबी सिर्फ याद है
    वो कहानी , जिसमे पात्र भी हम, और दर्शक भी हम
    देर सवेरे मंदिर के आँगन में बिखरे, फूलों की पंखुड़ियों से मेरे बचपन के टुकड़े
    आज दरकती लहरों में , वे बुझे हुए कुछ दिखते से हैं…………………
    बहुत सुन्दर संस्मरणीय गद्य काव्य …….ह्रदय स्पर्शी….बहुत सुन्दर मनो भाव ……. मर्मस्पर्शी ………….यशस्वी भव

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