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मेरी खिड़की के बाहर

एक बेचैन सा सागर रहता है

क्षितिज से भी दूर तक, ऊंचाइयों एवं गहराइयों में

लहराता हुआ सा वो कुछ यूँ बहता है

मानो मंजिल का पता ही नहीं, न ही जानने की परवाह है

बस इस अनर्गल से कलह में घुले हुए रोष को, बेबस होकर कुछ यूँ सहता है

कि दसो दिशाओं में बढ़ता हुआ सा, वो निराकार व निरंकुश सा

भव्य पर भयावह सा, शोर में कुछ कहता सा है

इस ऊंचाई पर, इस शोर में, सहमाती सी गहराइयों में, आगे जाने की इस होड़ में

एक ठहराव , एक संगीत , एक धरातल, एक शब्द सी

तुम .

मेरी खिड़की के बाहर

एक चाँद और कुछ तारे बिखरे से हैं

अशांत उस सागर से अछूते, इन ऊंचाइयों और गहराइयों से अभिन्न

बहाव के शोर से अविचलित, स्वयं की दुविधा में  बुझते जलते

उनको इस पाषाण सागर के किसी किनारे से देखती यूँ अविराम सी

तुम.

मेरी खिड़की के बाहर

एक ख्वाहिशों का तूफ़ान उमड़ता है

जलती तपती धूप में, कभी धुंए कभी ओस का, सैलाब सा बनता बिगड़ता है

ख्वाहिशें, कुछ पाने की कुछ छीनने की

कुछ ठंडी ओस सी कुछ काले धुंए सी, तूफानों में घिरी इन दीवारों में

धुओं में छुपी इन इमारतों में कहीं,  बारिश की पहली बूंदों सी

शांत सुन्दर शीतल सरल सी,  सभी ख्वाहिशों की से परे

तूफानों के बीच थमी हुई एक चाहत सी

तुम.

मेरी खिड़की के बाहर

एक मेला सा लगता है

अनजाने अजनबी चेहरों का, कुछ पहचाने अजनबी चेहरों का

इस सागर में सैलाब में, तूफ़ान में इस मेले में

एक पहचान तलाशते इस भीड़ में इस रेले में

धुंए के साथ जलते, लहरों के साथ बहते,  अपरिचित भावो वाले वो चेहरे

उम्मीद आशंका अविश्वास से डरे,  विश्वास व ख़ुशी के परदो से ढके

इन चेहरों में कहीं वो एक, जाना पहचाना सा, अपना सा माना सा

पल पल बदलते मेले में एक ठहराव मनमाना सा

तुम.

मेरी खिड़की के अन्दर

एक मैं और एक मैं , आपस में यूँ प्रलाप करते हैं

बेतहाशा अनायास सा ये सागर, सहरता भरमाता सा ये सैलाब

अब क्यों अपने से कुछ लगते हैं

ये चाँद ये रफ़्तार, ये लहरें ये ख्वाहिशें

नींद भरी आँखों में सुबह के सपने से क्यूँ लगते हैं

अनजान राहगीरों का ये मेला , अब एक जलसा सा क्यूँ लगता है

निराकार निरंकुश यह दृश्य , अब एक स्वप्न नगरी  सा क्यों लगता है ?

लहरों की ऊंची छलांग में , चाँद की शीतल छाँव में,

ख्वाहिशों के उस जूनून में , मेले की उस रौनक में

जो ख़ुशी है , जो जादू है , जो प्यार है,

वो हो तुम .

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खिड़की

6 thoughts on “खिड़की

  1. अपने से बतियाती, समाज के विभिन्न भावों से टकराती भावनाएं, भीड़-भाड ,शोरो गुल , और एक छलछलाते सागर से उठते मनोभाव, ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मुंबई में जुहू बीच के करीब के घर के झरोखे पर बैठ रचनाकार ने रचना का सृजन किया है l
    सारे कोलाहल से परे वो शांत अनंत आकाश का मनमोहक चित्रण ….सुन्दर l मशीनी युग और भीतर बाहर उठता तूफ़ान l
    जीवन की कशमकश और अनिश्चितता में जूझते शहरी मनुज, जिधर चल पड़े सब चल पड़े निरुद्देश्य भीड़ में समा जाने l कुछ ही चेहरे खुद को पहचानते हुए औरो से पृथक l
    कविता का उम्मीदों आशाओ सकारात्मकता से परिपूर्ण सुन्दर समापन l
    इस सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई मिस्टर लोकेश राज

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