EL-Top

Photo credit: http://www.flickr.com/photos/abhibrata

Amidst the never ending tests, quizzes, assignments, submissions, presentations, this little place is what we call our heaven. The 5 storied hostel building, at its terrace has a couple of rooms, and on the top of which are some water tanks and a mobile tower. A metal staircase leads to that place, where we spend nights, full of nothingness, of life, of non-sensible talks, of alcohol. It is called the ‘ELtop’- top of the elevated floor. In the darkness of night, it presents the most enchanting, and stare-until-you-can view of the Tata Steel Plant,soul and heart of this pretty little town called Jamshedpur. Tall chimneys; flames erupting from them; going up; almost getting diminished, and then rising up again. Blue, red, white, yellow- they’re in all colors. The blue one reminds me of the flame of the Goblet of fire, before it throws out Harry’s name. The little clouds of smoke erupt from the chimneys, and turn into patronus fighting away the dementors of night. The entire picture remains lighted up thought the night with small, twinkling nights, in stark contrast with the darkness of the surroundings. Came up with this one morning, after one such night, when sleeping seemed futile…

काले स्याह अन्धेरों के परदे पर

झिलमिलाते जुगनुओं से , वो रोशनी के टुकड़े…

रात के सीने पर सजे, जगमगाते आभूषणों से

टिमटिमाते मोतियों से, वो आतिशों से बिखरे

घनघोर तिमिर से लज्जित, उन झुकती आँखों की

डबडबाती चमक से बिखरे, वो रोशनी के टुकड़े…

इठलाती उस रोशनी के मेले में

श्याम फलक की चादर पर

बुझते जलते, बुझ बुझ कर जलते, वो अग्नि के परिंदे…

आशा, मंगल की आस में, रंग बदलते उस अविरल एहसास में

साक्षात, वहम, मिथक या आभास से,

उड़ने की निरंतर फ़िराक में, वो अग्नि के परिंदे

अंधेरों में प्रकाश की कयास में

उम्मीद, कामना के उस निरंतर आखिरी प्रयास में,

रोशनी के एक किरण के, अन्धकार से उस परिहास में

अविचलित अविराम दोनों के उस उपहास में

जलते बुझते, जल जल कर बुझते, वो अग्नि के परिंदे…

परिंदों की उस हलचल से

परों के प्रलाप से उठते, अन्तः के अनर्गल भावों से हलके

उड़ते, घुलते, बाह्य में विहल, वो धुंए के बादल…

निराकार है साकार कभी, जो सोचो है अवतार वही

नित नए नए वो रूपक है, उपमा नयी नयी हर पल

स्वच्छन्द स्वतंत्र. उड़ते बहते , वो धुंए के बादल

नित ऊंचा उठता जाना , यूँ आसमान में घुल जाना

अनंत गगन से मिलन की चाह में

विस्तृत परों से उड़ते हर पल हर्षल

ऊंचाइयों की थाह में, वो धुंए के बादल…

दृश्य विहंगम अनायास ये

कुछ कहता सा मालूम पड़ता है

मात्र लौह नहीं, यह लौह से जीवन का चित्रण करता है

रोशनी के प्रकाश में

अग्नि की ज्योति में

धुंए की उड़ान में

महसूस करो, सुनो कुछ अनसुनी सी बात सुनाता है

काली स्याह रात के परदे पर , तस्वीर नयी बनाते हर पल,

ये रोशनी के टुकड़े

ये अग्नि के परिंदे

ये धुंए के बादल…

2 thoughts on “EL-Top

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